सही बुखारी : १२९५ / सही मुस्लिम: १६२८


٤- عَنْ عَامِرِ بْنِ سَعْدِ بْنِ أَبِي وَقَّاصٍ عَنْ أَبِيهِ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ، قَالَ: كَانَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ يَعُودُنِي عَامَ حَجَّةِ الوَدَاعِ مِنْ وَجَعٍ اشْتَدَّ بِي، فَقُلْتُ: إِنِّي قَدْ بَلَغَ بِي مِنَ الوَجَعِ وَأَنَا ذُو مَالٍ، وَلاَ يَرِثُنِي إِلَّا ابْنَةٌ، أَفَأَتَصَدَّقُ بِثُلُثَيْ مَالِي؟ قَالَ: «لاَ» فَقُلْتُ: بِالشَّطْرِ؟ فَقَالَ: «لاَ» ثُمَّ قَالَ: «الثُّلُثُ وَالثُّلُثُ كَبِيرٌ - أَوْ كَثِيرٌ - إِنَّكَ أَنْ تَذَرَ وَرَثَتَكَ أَغْنِيَاءَ، خَيْرٌ مِنْ أَنْ تَذَرَهُمْ عَالَةً يَتَكَفَّفُونَ النَّاسَ، وَإِنَّكَ لَنْ تُنْفِقَ نَفَقَةً تَبْتَغِي بِهَا وَجْهَ اللَّهِ إِلَّا أُجِرْتَ بِهَا، حَتَّى مَا تَجْعَلُ فِي فِي امْرَأَتِكَ» فَقُلْتُ: يَا رَسُولَ اللَّهِ، أُخَلَّفُ بَعْدَ أَصْحَابِي؟ قَالَ: إِنَّكَ لَنْ تُخَلَّفَ فَتَعْمَلَ عَمَلًا صَالِحًا إِلَّا ازْدَدْتَ بِهِ دَرَجَةً وَرِفْعَةً، ثُمَّ لَعَلَّكَ أَنْ تُخَلَّفَ حَتَّى يَنْتَفِعَ بِكَ أَقْوَامٌ، وَيُضَرَّ بِكَ آخَرُونَ، اللَّهُمَّ أَمْضِ لِأَصْحَابِي هِجْرَتَهُمْ، وَلاَ تَرُدَّهُمْ عَلَى أَعْقَابِهِمْ، لَكِنِ البَائِسُ سَعْدُ ابْنُ خَوْلَةَ يَرْثِي لَهُ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ أَنْ مَاتَ بِمَكَّةَ.

(صحیح بخاری: ١٢٩٥ / صحیح مسلم: ١٦٢٨)


४- अबू इस्हाक़ सअद बिन अबी वक़्क़ास रज़ि० जो उन दस सहाबी में से एक हैं जिन्हें जन्नत की ख़ुशख़बरी दुनिया में ही दे दी गई थी। वे फ़रमाते हैं कि मेरी बीमारपुर्सी के लिए हज्जतुल विदाअ के साल रसूलुल्लाह ﷺ मेरे पास तशरीफ़ लाए। मुझे उस समय सख़्त दर्द था। मैंने आपसे कहा : "आप देख रहे हैं कि मेरा दर्द कैसी शिद्दत इख़्तियार कर गया है, मैं साहिबे माल हूं लेकिन मेरी वारिस सिर्फ़ मेरी एक ही बेटी है। क्या मैं अपने माल का दो तिहाई (2/3) हिस्सा खैरात कर दूं?" आपने फ़रमाया "नहीं।" मैंने कहा "आधा माल?" आपने फ़रमाया : "नहीं।" मैंने कहा "फिर या रसूलल्लाह ! एक तिहाई (1/3) माल सदक़ा कर दूं?" आपने फ़रमाया "तीसरा हिस्सा (तुम खैरात कर सकते हो) और तीसरा हिस्सा भी ज़्यादा बड़ा है, इसलिए कि तुम अपने वारिसों को साहिबे हैसियत छोड़ कर जाओ। यह इससे बेहतर है कि तुम उन्हें कंगाल करके जाओ और वे लोगों के सामने हाथ फैलाते फिरें। (याद रखो!) तुम जो भी अल्लाह की रज़ा के लिए खर्च करोगे तो उस पर तुम्हें सवाब मिलेगा, यहां तक कि जो लुक़मा तुम अपनी पत्नी के मुंह में डालोगे (उस पर भी सवाब होगा)" मैंने कहा : या रसूलल्लाह ! क्या मैं अपने साथियों के बाद पीछे छोड़ दिया जाऊंगा?" (मेरे साथी मुझसे पहले मर जाएंगे और मैं दुनिया में अकेला रह जाऊंगा?) आपने फ़रमाया (कि अगर ऐसा हुआ भी तो क्या ? यह तुम्हारे हक़ में अच्छा ही है) इसलिए कि साथियों की मौत के बाद, जब तुम उनके पीछे रह जाओगे, तो जो भी अमल अल्लाह की रज़ा के लिए करोगे, उससे तुम्हारे दर्जे में ज़्यादती और बुलन्दी ही होगी। और शायद तुम्हें अच्छी ज़िंदगी गुज़ारने का मौक़ा दिया जाए। यहां तक कि कुछ लोग (अहले ईमान) तुमसे फ़ायदा उठाएं और कुछ दूसरे लोगों (काफ़िरों) को तुमसे नुक्सान पहुंचे (फिर आपने दुआ फ़रमाई) ऐ अल्लाह! मेरे सहाबा की हिजरत को जारी (पूरा) फ़रमा दे और इनको उनकी ऐड़ियों पर न लौटा। लेकिन क़ाबिले रहम सअद बिन ख़ौला हैं, उनके लिए रसूलुल्लाह ﷺ रहमत की दुआ फ़रमाते थे इसलिए कि वह मक्का में अल्लाह को प्यारे हुए थे।

(सही बुखारी : १२९५)

(सही मुस्लिम: १६२८)


स्पष्टीकरण : सहाबा किराम रज़ि० उस शहर में ठहरना पसन्द नहीं करते थे, जिससे उन्होंने, उसकी मुहब्बत के बावजूद मात्र अल्लाह की रज़ा के लिए, हिजरत की थी। इसलिए हज़रत सअद डरते थे कि कहीं उनकी मौत मक्का में न आए। चुनांचे उनके लिए आपने हिजरत के जारी रहने की दुआ फ़रमाई और सअद बिन ख़ौला की दयनीय स्थिति पर आपने दुख व्यक्त किया, क्योंकि उनकी मौत मक्के में हुई। जिसकी वजह से वे हिजरत के पूरे सवाब से वंचित रहे।


फायदा :

१-यह हदीस इस बात की दलील है कि बीमारी में इंसान एक तिहाई माल (1/3) से ज़्यादा सदक़ा या वसीयत नहीं कर सकता।

२-इंसान की अगर नीयत सही हो तो पत्नी बच्चों पर जो कुछ ख़र्च करता है, उस पर भी उसे सवाब मिलता है।

३-किसी सही उद्देश्य की ख़ातिर अपनी बीमारी या तकलीफ़ व्यक्त कर सकता है, ताकि उसका इलाज या दुआ की जा सके। यह अल्लाह के ख़िलाफ़ शिकवा नहीं है।

४-अल्लाह की राह में ख़र्च व सदक़ात में अपने क़रीब तरीन रिश्तेदारों को प्रमुखता दी जाए।


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मक्तबा मिस्बाहुल इस्लाम अहमदाबाद, गुजरात

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