٧- عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، قَالَ: قَالَ رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: صَلَاةُ الرَّجُلِ فِي جَمَاعَةٍ تَزِيدُ عَلَى صَلَاتِهِ فِي بَيْتِهِ، وَصَلَاتِهِ فِي سُوقِهِ، بِضْعًا وَعِشْرِينَ دَرَجَةً، وَذَلِكَ أَنَّ أَحَدَهُمْ إِذَا تَوَضَّأَ فَأَحْسَنَ الْوُضُوءَ، ثُمَّ أَتَى الْمَسْجِدَ لَا يَنْهَزُهُ إِلَّا الصَّلَاةُ، لَا يُرِيدُ إِلَّا الصَّلَاةَ، فَلَمْ يَخْطُ خَطْوَةً إِلَّا رُفِعَ لَهُ بِهَا دَرَجَةٌ، وَحُطَّ عَنْهُ بِهَا خَطِيئَةٌ، حَتَّى يَدْخُلَ الْمَسْجِدَ، فَإِذَا دَخَلَ الْمَسْجِدَ كَانَ فِي الصَّلَاةِ مَا كَانَتِ الصَّلَاةُ هِيَ تَحْبِسُهُ، وَالْمَلَائِكَةُ يُصَلُّونَ عَلَى أَحَدِكُمْ مَا دَامَ فِي مَجْلِسِهِ الَّذِي صَلَّى فِيهِ، يَقُولُونَ: اللهُمَّ ارْحَمْهُ، اللهُمَّ اغْفِرْ لَهُ، اللهُمَّ تُبْ عَلَيْهِ، مَا لَمْ يُؤْذِ فِيهِ، مَا لَمْ يُحْدِثْ فِيهِ.
(صحيح بخاری: ٤٧٧)
(صحیح مسلم : ٦٤٩)
७- हज़रत अबू हुरैरह रज़ि॰ से रिवायत है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया : "आदमी की जमाअत के साथ पढ़ी हुई नमाज़, उस नमाज़ से कुछ ऊपर 20 दर्जे ज़्यादा श्रेष्ठता रखती है जो वह अपने बाज़ार या घर में पढ़ता है। इसलिए कि जब कोई व्यक्ति अच्छे तरीके से वुजू करता, फिर नमाज़ के इरादे से मस्जिद में आता है, उसे नमाज़ ही मस्जिद की तरफ़ ले जाती है, तो ऐसे व्यक्ति के हर क़दम के बदले एक दर्जा बुलन्द और एक गुनाह माफ़ होता है यहां तक कि वह मस्जिद में दाखिल हो जाता है। फिर जब वह मस्जिद में दाखिल हो जाता है, तो जब तक नमाज़ उसको वहां रोके रखती है, वह नमाज़ में ही शुमार होगा (यानी जमाअत के इंतज़ार में या ज़िक्रे इलाही में व्यस्त, जब तक मस्जिद में रहेगा, वह अल्लाह के यहां नमाज़ की हालत में समझा जाएगा) और फ़रिश्ते तुम्हारे एक आदमी के बारे में रहमत की दुआ करते रहते हैं जब तक वह अपनी उस मज्लिस में बैठा रहे जिसमें उसने नमाज़ पढ़ी है। फ़रिश्ते कहते हैं, ऐ अल्लाह! इस पर रहम फ़रमा, ऐ अल्लाह ! इसको बख़्श दे, ऐ अल्लाह ! इस पर रुजूअ फ़रमा, (ये दुआएं उसके हक़ में उस समय तक जारी रहती हैं) जब तक वह किसी को कष्ट न पहुंचाए। जब तक बे वुजू न हो।
( सही बुखारी: ४७७)
( सही मुस्लिम: ६४९)
फ़ायदा :
१- इससे मालूम हुआ कि बाज़ारों और घरों में अकेले नमाज़ पढ़नी जाइज़ तो है, लेकिन जमाअत के साथ पढ़ने की 25, 26 या 27 दर्जे ज़्यादा श्रेष्ठता है जैसा कि अन्य रिवायात में है।
२- नमाज़, अन्य भले कर्मों से श्रेष्ठ है क्योंकि फ़रिश्ते नमाज़ी के हक़ में दुआए खैर करते हैं।
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मक्तबा मिस्बाहुल इस्लाम अहमदाबाद, गुजरात

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