صحيح البخاری : ٦٣٠٧
८- हज़रत अबू हुरैरह रज़ि० रिवायत करते हैं कि मैंने सुना, रसूलुल्लाह ﷺ फ़रमाते थे : "अल्लाह की क़सम ! मैं दिन में 70 मर्तबा से ज़्यादा अल्लाह से गुनाहों की बख़्शीश मांगता और उसकी बारगाह में तौबा करता हूं।
(सही बुख़ारी: ६३०७)
फ़ायदा :
(१) इसमें तौबा व इस्तगफ़ार की तर्गी़ब है कि जब नबी ﷺ जो बख़्शे हुए थे, अल्लाह ने आपके अगले पिछले तमाम गुनाह माफ़ फ़रमा दिए थे, जो असल में गुनाह भी नहीं थे बल्कि हसनातुल अबरार सइयातुल मुकर्रबीन के मुताबिक़ ख़िलाफ़ ऊला काम थे, जिन्हें गुनाह का नाम दे दिया गया। तो फिर हम आम लोग किस तरह तौबा व इस्तगफ़ार से बेनियाज़ रह सकते हैं। जबकि (सर-से लेकर पांव तक) हम, गुनाहों में डूबे हुए हैं।
(२) तोबा की अधिकता और उसका करते रहना जरूरी है ताकि बे समझे बूझे गुनाह भी माफ़ होते रहें। अगली हदीस में भी तौबा की ताकीद है।
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मक्तबा मिस्बाहुल इस्लाम अहमदाबाद, गुजरात

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