٣- وعن أبي يَزِيدَ مَعْنِ بنِ بريد بن الأخنس رضي الله عنهم وهو وأبوه وَجَدُّه صحابيون قال : وَكَانَ أَبِي يَزِيدُ أَخْرَجَ دَنَانِيرَ يَتَصَدَّقُ بِهَا فَوَضَعَهَا عِنْدَ رَجُلٍ فِي الْمَسْجِدِ فَجِئْتُ فَأَخَذْتُهَا فَأَتَيْتُهُ بِهَا فَقَالَ وَاللَّهِ مَا إِيَّاكَ أَرَدْتُ فَخَاصَمْتُهُ إِلَى رَسُولِ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ فَقَالَ لَكَ مَا نَوَيْتَ يَا يَزِيدُ وَلَكَ مَا أَخَذْتَ يَا مَعْنُ.
(صحیح بخاری: ١٤٢٢)
३- हज़रत अबू यज़ीद मअन बिन यज़ीद बिन अख़नस रज़ि० (यह मअन ख़ुद उनके बाप यज़ीद और दादा, अख़नस तीनों सहाबी हैं) ने बयान किया कि मेरे बाप यज़ीद ने कुछ दीनार सदक़े के लिए निकाले और वह उन्हें मस्जिद (नबवी ﷺ) में एक आदमी के पास रख आए (ताकि वह किसी ज़रूरतमंद को दे दे) मैं मस्जिद में आया तो मैंने वह दीनार उससे ले लिये (क्योंकि मैं ज़रूरतमंद था) और घर ले आया। जब वालिद को मालूम हुआ तो उन्होंने फ़रमाया "वल्लाह! तुझको तो देने का मैंने इरादा नहीं किया था।" चुनांचे मैं अपने वालिद को नबी ﷺ की ख़िदमत में ले आया और यह झगड़ा आपके सामने पेश कर दिया। आपने फ़रमाया: "ऐ यज़ीद! तेरे लिए तेरी नीयत का सवाब है और ऐ माअन! तूने जो लिया है, वह तेरे लिए (जाइज़) है।
(सही बुखारी : १४२२)
फ़ायदा :
(१) इससे मालूम हुआ कि अगर सदक़ा गैर इरादी तौर पर मोहताज बेटे के हाथ में आ गया तो उसे वापस लेने की ज़रूरत नहीं है, क्योंकि बाप ने तो किसी हक़दार को देने की नीयत की थी। उसे उसकी नीयत के मुताबिक़ सदके़ का सवाब मिल गया। लेकिन यह बात कुछ उलमा के नज़दीक नफ़्ली सदके़ जैसी होगी, क्योंकि सदक़ा वाजिबा (ज़कात) की रक़म उनको नहीं दी जा सकती, जिनका ख़र्च इंसान के ज़िम्मे वाजिब है।
(2) सदके़ के लिए किसी को दलील बनाना जाइज़ है।
(3) शरई हुक्म मालूम करने के लिए बाप को वास्तविक शासक या आलिमे दीन के पास ले जाना, बाप की अवज्ञा नहीं है। जैसे शरई मसाइल में आपसी बहस व तकरार गुस्ताख़ी नहीं है।
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मक्तबा मिस्बाहुल इस्लाम अहमदाबाद, गुजरात

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